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The story of a daughter's voice and a husband's self-evaluation
लाइफस्टाइल

एक बेटी की आवाज और एक पति की आत्ममूल्यांकन की कहानी

“तुम्हें कितनी बार बताया है, मेरे तैयार होने से पहले मेरा नाश्ता तैयार हो जाना चाहिए। शादी के 25 सालों बाद भी मुझे क्यों बार-बार एक ही बात बतानी पड़ती है, सुनीता! तुम्हें क्या है? तुम तो आराम से घर पर रहोगी, मुझे काम पर जाना पड़ता है। तुम हो कि हमेशा बेवकूफों जैसी हरकत करती हो। अगर तुम यह जानबूझकर करती हो तो याद रखना मुझसे बुरा कोई नहीं होगा” आज भी अर्जुन का पारा चढ़ा हुआ था।
इन कटु शब्दों में अपना गुस्सा उतारते हुए, गीला तौलिया कुर्सी पर फेंकते हुए अर्जुन गुस्से से सुनीता की तरफ देखने लगा।
सुनीता के लिए अर्जुन का यह बेवजह का गुस्सा कोई नई बात नहीं थी। वह महीने में तीन चार बार ऐसे ही सुनीता पर बरस पड़ता था। पहले पहले सुनीता उसका विरोध किया करती थी लेकिन जब कई सालों तक अर्जुन में कोई बदलाव नहीं दिखा तो सुनीता ने खुद को ही बदल दिया। अब अर्जुन के कुछ भी कहने से सुनीता को कोई फर्क नहीं पड़ता था। अर्जुन की हर बात वह चुपचाप सिर नीचे झुकाए सुन लेती थी।
शादी के पहले 5 साल तक सुनीता ने पूरी कोशिश की थी कि अर्जुन को बदला जाए। लेकिन फालतू का गुस्सा करना और बाद में सुनीता को भला-बुरा कहना यह मानो उसकी आदत बन गई थी।
कोई भी वाद-विवाद होता तो अर्जुन सीधा सुनीता को बोल देता, “अगर मैं तुम्हें अच्छा नहीं लगता तो क्यों नहीं चली जाती अपने मायके? क्यों रहती हो मेरे साथ?”
इतना सब कुछ होने के बावजूद सुनीता अर्जुन के साथ रहती थी क्योंकि उसे अपनी बेटी की फिक्र थी। और वह जाति भी तो अपने बूढ़े हो चुके मां-बाप को इस उम्र में परेशान करना नहीं चाहती थी। समाज और लोग क्या कहेंगे? यह भी तो उसे देखना था। वह इतनी पढ़ी-लिखी भी तो नहीं थी कि खुद जाकर कोई नौकरी कर सके और अपना और अपनी बेटी का पालन-पोषण कर सके।
सुनीता को अब अपनी फिक्र नहीं थी। उसे फिक्र थी तो बस अपनी शादी लायक हो रही बेटी की। सुनीता नहीं चाहती थी कि पति-पत्नी के झगड़े की वजह से राधा डिस्टर्ब हो। राधा की पढ़ाई पूरी हो चुकी थी और उसके लिए अब शादी के रिश्ते आने लगे थे।
कई रिश्तों को राधा ठुकरा चुकी थी। दो-तीन महीने बाद एक अच्छा रिश्ता आया, रिश्तेदारों और पहचान के लोगों ने भी लड़के के बहुत गुणगान किए थे। अर्जुन एक शाम अपनी बेटी के पास बैठकर उसे बताने लगा, “राधा, बहुत अच्छा लड़का है। पढ़ा-लिखा है, बड़ा घर है, बहुत अच्छी नौकरी है। ऐसे रिश्ते बार-बार नहीं आते बेटी। इस बार मना मत करना।”
राधा अपने पिता से ज्यादा बात नहीं करती थी। शायद डरती थी या शायद नफरत करती थी लेकिन आज उसने अपनी पूरी हिम्मत इकट्ठा कर बोला, “मुझे अभी शादी नहीं करनी है पापा। मैं नौकरी करना चाहती हूं। खुद अपने पैरों पर खड़ी होना चाहती हूं।”
“हां तो उसमें क्या बड़ी बात है? मैंने लड़के से बात की है। वह तुम्हें किसी बात के लिए नहीं रोकेगा। तुम शादी के बाद भी नौकरी कर सकती हो। वह तुम्हें नौकरी के लिए परमिशन दे देगा।” अर्जुन बोला।
“मेरा नौकरी करना या ना करना उसकी परमिशन पर क्यों डिपेंड रहेगा पापा?” राधा ने पूछा।
“मैं कह रहा हूं ना, तुम्हें किसी भी चीज की कमी नहीं होगी वहां। ऐसे रिश्ते बार-बार नहीं आते। इसे ठुकरा मत, बहुत खुश रहोगी तुम वहां।” अर्जुन बोला।
“पापा क्या मैं उतनी ही खुश रहूंगी जितनी मम्मी इस घर में खुश है?” राधा ने तंज कसते हुए कहा।
“आज तुम्हारी जबान कुछ ज्यादा नहीं चल रही?” अर्जुन गुस्से से आंखें बड़ी करते हुए बोला।
“पापा मुझे शादी ही नहीं करनी है क्योंकि शादी के बाद अगर वह लड़का आपके जैसा निकला तो मैं क्या करूंगी! मुझे आपके जैसा जीवनसाथी नहीं चाहिए जो बिना बात के मुझ पर हमेशा चिल्लाए। मुझे कुछ भी अपनी पसंद का लेना हो तो 10 बार सोचना पड़े कहीं वह नाराज न हो जाए। मेरी तबीयत कैसी भी हो उसे परवाह न हो। रोटी थोड़ी सी मोटी बन जाए तो घर सिर पर उठा ले। उसकी चेक बुक न मिले तो भी मेरा ही दोष निकालें। और हर छोटी-मोटी बात पर मुझे मायके जाने के लिए कहे।” राधा ने अपना दिल खाली करते हुए पापा से सब कह दिया।
अर्जुन का गुस्सा सातवें आसमान पर था लेकिन उसके मुंह से एक भी शब्द नहीं फूट रहा था। वह राधा की बातें सुन रहा था।
राधा उतना ही बोलकर चुप नहीं हुई, आज पहली बार वह अपने पापा के सामने इतना कुछ बोल रही थी, “पापा आपने मां के साथ हमेशा गलत व्यवहार किया है। आप अपने ऑफिस का गुस्सा बिना सोचे-समझे मां पर उतार देते हैं, कभी इस बात की परवाह भी नहीं करते कि उन्हें कैसा लगता होगा! आपकी बातें सुन-सुनकर मां ने अपना स्वाभिमान खो दिया।”
अर्जुन आज पहली बार अपने किए बर्ताव को महसूस कर पा रहा था। वह इतना ही बोल पाया, “जो तुम्हारा मन है वो करो, मैं तो इतना बुरा हूं ना!”
राधा ने अर्जुन का हाथ पकड़ा और बोली, “पापा मुझे सिर्फ एक सवाल का जवाब दे दो, क्या आप चाहेंगे कि मेरा पति आपके जैसा हो? अगर आपका जवाब हां है तो कर दीजिए मेरा रिश्ता आज ही। और ना है तो मुझे आत्मनिर्भर बनने दीजिए।”
अर्जुन कुछ भी न बोल पाया और वहां से चुपचाप बाहर चला गया। आज उसे सुनीता के सामने जाने में शर्म आ रही थी। चलते-चलते उसकी आंखों से आंसू बह रहे थे। अर्जुन ने आज से अपने आप को बदलने का निश्चय किया।
अगले दिन से सुनीता ने अपने पति में काफी बदलाव देखा। वह सोचने लगी कि जो हिम्मत राधा ने दिखाई है, वह हिम्मत अगर मैं पहले ही दिखा देती तो शायद आज परिस्थिति कुछ और होती। अब राधा पढ़-लिख कर अच्छी नौकरी करने लगी थी और 3 साल बाद उसके लिए एक अच्छा रिश्ता आया और उसकी विदाई पर अर्जुन बोला, “बेटा तू हमेशा खुश रहेगी क्योंकि तेरा पति तेरे बाप जैसा नहीं है।”
अर्जुन की यह बात सुनकर सुनीता और राधा की आंखों से आंसू बहने लगे।
दोस्तों, हमारे समाज में औरतों को भले ही देवी का दर्जा दिया जाता है लेकिन उन्हें स्वतंत्रता नहीं दी जाती जो उन्हें देनी चाहिए।
उन्हें बचपन से ही बताया जाता है कि वह पराया धन हैं। स्कूल से आने में देर हो जाए तो पिटाई मिलती है। मोबाइल पर बातें करते हुए दिख जाए या खिड़की से झांकते हुए दिख जाए तो शक किया जाता है। मां-बाप का घर तुम्हारा नहीं है, पति का घर ही तुम्हारा घर है, जीवन भर यह बातें बता-बता कर उन्हें ससुराल भेजा जाता है। और एक दिन किसी छोटे-मोटे झगड़े में ससुराल वालों से उन्हें सुनना पड़ता है कि इस घर को छोड़ दो और मायके चली जाओ!
अब आप ही बताएं दोस्तों, ऐसी स्त्रियों का सच्चा घर कौन सा? आखिरकार वह किस घर को अपना कहें?

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