यह कहानी एक गरीब ब्राह्मण परिवार की लड़की की है, जिसकी शादी महज 9 साल की उम्र में पच्चीस वर्षीय पुरुष से कर दी गई थी। मात्र 14 साल की उम्र में, वह एक मां बन गई थी। स्त्री के लिए किसी भी उम्र में मां बनने का अनुभव अंदरूनी खुशी प्रदान करता है, लेकिन आनंदीबाई के लिए यह खुशी टिक नहीं पाई, क्योंकि 11 दिन के शिशु की मृत्यु हो गई।
शिशु की मृत्यु का दुख पूरे परिवार के लिए भारी था, लेकिन आनंदीबाई के लिए यह दुख और भी गहरा था। इस अत्यंत दुखभरे समय में, आनंदीबाई ने एक दृढ़ प्रण लिया। उसने अपने आप से कहा, “जो मेरे साथ हुआ, वह किसी और लड़की के साथ नहीं होने दूंगी। अब मैं खूब अभ्यास करूंगी और डॉक्टर बनूंगी, ताकि शिशुओं की मौत को रोका जा सके।”
डेढ़ सौ साल पहले एक महिला के लिए डॉक्टर बनना आसान नहीं था। लेकिन आनंदीबाई का सौभाग्य था कि उसे एक प्रेमी और समझदार पति मिला, जिन्होंने उसकी इस महत्वाकांक्षा को पूरा करने के लिए सब कुछ दांव पर लगा दिया। वे कई सामाजिक दबाव और आर्थिक कठिनाइयों का सामना करते हुए अमेरिका में चिकित्सा की पढ़ाई के लिए भेजे गए।
आनंदीबाई ने 19 साल की उम्र में अमेरिका में मेडिकल की पढ़ाई शुरू की और 1886 में अपनी पढ़ाई पूरी की। सिर्फ 21 साल की उम्र में, वह पहली भारतीय महिला डॉक्टर बन गईं और इतिहास रच दिया। भारत लौटने पर, कोल्हापुर की रियासत ने उन्हें अल्बर्ट एडवर्ड अस्पताल की महिला वार्ड के मुख्य डॉक्टर के रूप में नियुक्त किया।
यह कहानी काल्पनिक नहीं, बल्कि पूरी तरह सच्ची है। डॉ. आनंदीबाई जोशी और उनके पति गोपाल राव जोशी के संघर्ष और दृढ़ संकल्प ने एक नए युग की शुरुआत की।
आज के समय में, जहां कुछ पत्नियां अपने पति के बलिदान को भूल जाती हैं, हमें डॉ. आनंदीबाई जोशी की याद रखनी चाहिए। उनकी प्रेरणा और संघर्ष ने न केवल उनके परिवार या गांव, बल्कि पूरे देश को गर्वित किया। उनकी कहानी हमें यह सिखाती है कि किसी भी बाधा के बावजूद, दृढ़ संकल्प और सच्ची मेहनत से सफलता संभव है।
