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Priyanka fulfilled her parents' wish and turned her home into a temple
धर्म

प्रियंका ने मां-बाप की इच्छा पूरी कर घर को मंदिर बना दिया

जगदीशपुर के एक छोटे से घर में शादी की चहल-पहल थी। मधु नई बहू के स्वागत की तैयारी में लगी थीं। थोड़ी ही देर में राहुल अपनी दुल्हन प्रियंका को लेकर गाड़ी से नीचे उतरा। मधु ने अपनी नई-नवेली बहू की आरती उतारते हुए कहा, “भगवान तुम दोनों के जीवन में खुशियां भरे, तुम्हारे आने से मेरा घर मंदिर हो जाए।” फिर शुरू हुई मुंह दिखाई की रस्म और इन सब में पूरा दिन बीत गया। दो-चार दिन में मेहमानों से भरा घर खाली हो गया। अब घर में सिर्फ पांच लोग बचते हैं- मधु, रामेश्वर, राहुल, प्रियंका, और किशन।
शादी को 10 दिन बीत चुके थे। एक दोपहर, राहुल प्रियंका से कहता है, “सोच रहा हूं कि ऑफिस जॉइन कर लूं।” प्रियंका तुरंत बिस्तर से उठ कर बैठ जाती है, “क्या हम हनीमून पर नहीं जा रहे हैं?” राहुल ने जवाब दिया, “अभी शादी में बहुत खर्चा हो गया है। आने वाले एक-दो महीने में जाते हैं न!” प्रियंका ने पूछा, “पक्का!” राहुल ने जवाब दिया, “हां! पक्का।”
अगले दिन राहुल ऑफिस के लिए निकल जाता है। शाम को राहुल घर पहुंचा तो देखा कि मधु, रामेश्वर और किशन, प्रियंका के साथ टीवी देख रहे थे। मधु प्रियंका से कहती है, “लो बहू, आ गए हमारे नवाबजादे।”
थोड़े समय में डिनर करने के लिए परिवार के सभी सदस्य बैठते हैं। रामेश्वर ने राहुल से कहा, “अब तुम्हारी शादी हो गई। किशन को लेकर हमें कोई चिंता नहीं है। तुम उसकी पढ़ाई देख ही रहे हो। सिर्फ एक इच्छा है वैकुंठ जाने से पहले मैं और तुम्हारी मां **काशी** जाना चाहते हैं।” “बिल्कुल पिताजी, मैं आप लोगों की यह इच्छा पूरी करूंगा।” राहुल ने हामी भरते हुए प्रियंका की तरफ देखा और मन ही मन सोचने लगा कि पत्नी को खुश करूं कि मां-बाप को।
खाना खाने के बाद राहुल और प्रियंका कमरे में जाते हैं। प्रियंका थोड़ी नाराज़ लग रही थी। राहुल समझ गया कि उसे हनीमून पर जाना है। अगली सुबह वह रामेश्वर से कह देता है कि “मैं पहले प्रियंका को हनीमून पर ले जाऊंगा, उसके बाद आप लोग काशी जाना।” बेटे की इस बेरुखी से रामेश्वर को दुख हुआ, वह बोले, “मेरा तो ठीक है बेटा, लेकिन अपनी मां के बारे में सोच। वह कल से कितनी खुश है।” राहुल बिना कुछ कहे चला जाता है। ऑफिस के लिए निकलते समय वह लंच बॉक्स भी नहीं ले जाता। प्रियंका को ये बात और खराब लगती है।
शाम को वह घर आता है और प्रियंका को अपना डेबिट कार्ड देते हुए कहता है, “नाराज़ मत हो। ये लो कार्ड, तुम्हें जहां भी जाना है, टिकट बुक कर लो।” अगले दिन राहुल के फोन पर बैंक का मैसेज आता है। वह समझ जाता है कि प्रियंका ने आखिर टिकट बुक कर लिया।
शाम को खाने की टेबल पर सब काफी खुश होकर बैठे रहते हैं। इतने में मधु अपने बेटे का माथा चूम लेती है। राहुल के चेहरे पर सवालिया निशान साफ झलकने लगते हैं। तभी रामेश्वर बेटे की पीठ पर हाथ फेरते हुए कहते हैं, “थैंक्यू बेटा! परसो हमें निकलना है काशी के लिए।” आश्चर्य के साथ राहुल ने प्रियंका की तरफ देखा। प्रियंका मुस्कुरा दी। कमरे में पहुंचने के बाद प्रियंका ने कहा, “इच्छा चाहे किसी की भी हो, पूरी होनी चाहिए। क्या हुआ अगर पहले मां-बाबू जी घूम आएंगे।” राहुल ने पत्नी को गले लगाते हुए कहा, “माता-पिता को सर्वश्रेष्ठ बना कर, तुमने सच में घर को मंदिर कर दिया।”
कहानी यह दर्शाती है कि सच्ची खुशी निःस्वार्थता, समझौते और अपनों की जरूरतों को अपनी इच्छाओं से ऊपर रखने से मिलती है।

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