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आईआईएफएल फाइनेंस: को-लेंडिंग से भारत में अंतिम छोर तक लोन वितरण में तेजी

मुंबई, 8 जुलाई 2026: आईआईएफएल फाइनेंस ने आज कहा कि बैंकों और गैर-बैंकिंग वित्तीय कंपनियों (एनबीएफसी) के बीच को-लेंडिंग की साझेदारी एक बड़ा बदलाव ला सकती है। इससे उन लोगों तक किफायती और औपचारिक लोन पहुँचाया जा सकेगा, जिनकी पहुँच इस तक कम है। यह कदम भारत में वित्तीय समावेशन के अगले चरण को और मजबूत करेगा।

बदलते क्रेडिट इकोसिस्टम पर बात करते हुए, आईआईएफएल फाइनेंस के हेड – गोल्ड लोन, श्री मयंक शर्मा ने कहा कि भारत की वित्तीय समावेशन की यात्रा का ध्यान अब इस बात पर होना चाहिए कि पूरे देश में उद्यमियों, किसानों, अपना काम करने वाले पेशेवरों और एमएसएमई तक सही समय पर और जिम्मेदारी के साथ लोन पहुँच सके।

श्री शर्मा ने कहा, “आज वित्तीय समावेशन का मतलब यह है कि हर महत्वाकांक्षी उद्यमी को किफायती संस्थागत लोन आसानी से मिल सके। को-लेंडिंग, बैंकों और एनबीएफसी की खूबियों को एक साथ जोड़ती है, जिससे इसे बड़े पैमाने पर मुमकिन बनाया जा सकता है।”

उन्होंने आगे कहा कि बैंक जहाँ कम लागत वाली पूंजी और मजबूत बैलेंस शीट देते हैं, वहीं एनबीएफसी स्थानीय बाजार की गहरी समझ, दूर-दराज के इलाकों में ग्राहकों तक सीधी पहुँच और मजबूत रिश्ते बनाने का काम करते हैं। ये दोनों मिलकर लोन मिलने की प्रक्रिया को आसान बना सकते हैं, लोन बाँटने में तेज़ी ला सकते हैं और असंगठित कर्जदाताओं पर लोगों की निर्भरता को कम कर सकते हैं।

श्री शर्मा ने भारतीय रिजर्व बैंक के को-लेंडिंग फ्रेमवर्क का स्वागत किया। उन्होंने कहा कि यह फ्रेमवर्क प्रशासन, जोखिम साझा करने और ग्राहकों की सुरक्षा के मामले में स्पष्ट नियम देता है। इससे बैंकों और एनबीएफसी के बीच एक जिम्मेदार और मजबूत साझेदारी की नींव तैयार होती है।

उन्होंने जन-धन, आधार, यूपीआई और अकाउंट एग्रीगेटर फ्रेमवर्क जैसे सरकार के डिजिटल पब्लिक इंफ्रास्ट्रक्चर की भूमिका पर भी ज़ोर दिया, जो नई पीढ़ी के लोन वितरण को संभव बना रहे हैं।

उन्होंने कहा, “डिजिटल ऑनबोर्डिंग, एआई आधारित अंडरराइटिंग और सहमति से डेटा साझा करने की सुविधा के जरिए तकनीक, को-लेंडिंग को और अधिक प्रभावी बना रही है। भारत के डिजिटल इंफ्रास्ट्रक्चर के साथ मिलकर, इसमें आख़िरी छोर तक लोन वितरण को काफी हद तक सुधारने की क्षमता है।”

भारत के एमएसएमई सेक्टर के लिए को-लेंडिंग के महत्व को बताते हुए, श्री शर्मा ने कहा कि स्थानीय एनबीएफसी को क्षेत्रीय व्यवसायों और असंगठित आय के तरीकों की अच्छी समझ होती है। इससे वे उन ग्राहकों को भी लोन दे पाते हैं, जो बैंकिंग के पारंपरिक पैमानों पर खरे नहीं उतर पाते।

श्री शर्मा ने अपनी बात खत्म करते हुए कहा, “को-लेंडिंग की असली सफलता इस बात से तय होगी कि कितने उद्यमियों को सशक्त बनाया गया, कितने व्यवसायों को लोन मिला और कितनी आजीविकाओं को सहारा मिला। आरबीआई और सरकार द्वारा बनाए गए इस अनुकूल फ्रेमवर्क के साथ, को-लेंडिंग भारत के वित्तीय समावेशन के अगले चरण का एक अहम स्तंभ बन सकता है। इससे यह सुनिश्चित होगा कि लोगों को मिलने वाले अवसर उनके भौगोलिक स्थान से नहीं, बल्कि उनके सपनों और आकांक्षाओं से तय हों।

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