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गुजरात का 'पावर ग्रिड
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गुजरात का ‘पावर ग्रिड’: विकास की हाई-वोल्टेज धड़कन और गलतफहमियों का अवरोध?

जब आज पूरा देश हरित ऊर्जा और आत्मनिर्भर बिजली व्यवस्था की ओर बढ़ रहा है, तब गुजरात इस परिवर्तन का सबसे मजबूत केंद्र बनकर उभरा है। कच्छ के विशाल रेगिस्तानी इलाकों से लेकर दक्षिण गुजरात के औद्योगिक शहरों तक फैला हाई-वोल्टेज ट्रांसमिशन नेटवर्क केवल तारों और टावरों का जाल नहीं है, बल्कि ये हमारे ‘विकसित गुजरात’ की हाई-वोल्टेज धड़कनें हैं। राज्य के किसानों और जमीन मालिकों के लिए ये विशाल ऊंचे टावर वैश्विक ऊर्जा बदलाव (ग्लोबल एनर्जी ट्रांजिशन) में गुजरात के ऐतिहासिक नेतृत्व के जीवंत प्रतीक हैं।

लेकिन, इस विकास यात्रा के समानांतर एक और चुनौती खड़ी है। जब राज्य 100 गीगावाट (GW) रिन्यूएबल ऊर्जा क्षमता के अपने महत्वाकांक्षी लक्ष्य की ओर कदम बढ़ा रहा है, तब ग्रिड के इस विस्तार को जमीन पर कुछ अवांछित भ्रांतियों और हिचकिचाहट का सामना करना पड़ रहा है। देश के पावर सेक्टर में गुजरात के इस ‘लाइटहाउस’ मॉडल की चमक बनाए रखने के लिए यह आवश्यक है कि हम वैज्ञानिक तर्कों को अफवाहों के कोहरे से अलग करके देखें।

भ्रम: हाई-वोल्टेज लाइनों के करीब रहने से स्वास्थ्य को खतरा होता है
हकीकत: अंतरराष्ट्रीय स्वास्थ्य मानक और भारत के सख्त नियम पूर्ण सुरक्षा सुनिश्चित करते हैं।
इस इंफ्रास्ट्रक्चर को लेकर सबसे पहली और आम आशंका इलेक्ट्रोमैग्नेटिक फील्ड (EMF) यानी विद्युत चुंबकीय क्षेत्र को लेकर उठाई जाती है। लेकिन विज्ञान के पास इसका ठोस और जांचा-परखा जवाब है। विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) ने दशकों के वैश्विक शोध के बाद यह स्पष्ट किया है कि पावर लाइनों से निकलने वाले लो-लेवल EMF का मानव स्वास्थ्य पर कोई भी प्रतिकूल शारीरिक प्रभाव दर्ज नहीं हुआ है।

गुजरात के संदर्भ में, गुजरात एनर्जी ट्रांसमिशन कॉरपोरेशन लिमिटेड और केंद्रीय विद्युत प्राधिकरण द्वारा तय किए गए सुरक्षा दायरे अंतरराष्ट्रीय मानकों से भी अधिक कड़े हैं। भौतिक विज्ञान का नियम है कि दूरी बढ़ने के साथ EMF का प्रभाव तेजी से खत्म होता है। जब तक आप इन लाइनों के तय सुरक्षित दायरे (राइट-ऑफ-वे) के मुहाने पर आते हैं, तब तक इसका प्रभाव आपके घर में चलने वाले वैक्यूम क्लीनर या हेयर ड्रायर से भी कम हो जाता है। अतः, ये लाइनें विकास की राह में एक सुरक्षित और भरोसेमंद पड़ोसी की तरह हैं।

भ्रम: ट्रांसमिशन नेटवर्क से कृषि भूमि बेकार हो जाती है
हकीकत: आधुनिक इंजीनियरिंग का मंत्र है- जमीन का न्यूनतम उपयोग, फसल की अधिकतम सुरक्षा।
गुजरात के जागरूक किसान समुदाय के बीच एक आम डर यह है कि ट्रांसमिशन टावर लगने का मतलब खेती का खत्म होना है। हकीकत में, राज्य में आधुनिक ग्रिड प्लानिंग इस तरह की जाती है कि उपजाऊ जमीन पर इसका कम से कम असर पड़े।

हालांकि टावर का आधार जमीन का एक छोटा सा हिस्सा घेरता है, लेकिन लाइनों के नीचे की बाकी जमीन पूरी तरह उत्पादक बनी रहती है। सौराष्ट्र और उत्तर गुजरात में हाई-वोल्टेज लाइनों के ठीक नीचे मूंगफली, कपास और अरंडी (कैस्टर) की फसलों को लहलहाते देखना एक आम बात है। किसान मानक सुरक्षा सावधानियों का पालन करते हुए मवेशियों को चराना और कम ऊंचाई वाली फसलों की खेती जारी रख सकते हैं। इसके अलावा, भीड़भाड़ वाले या संवेदनशील इलाकों में नई तकनीक का इस्तेमाल यह सुनिश्चित कर रहा है कि गुजरात की कृषि ‘हरित क्रांति’ और ‘ऊर्जा क्रांति’ दोनों साथ-साथ आगे बढ़ें।

भ्रम: क्या दूर से ही इंसान को खींच लेती है बिजली?
हकीकत: बहुस्तरीय सुरक्षा प्रोटोकॉल और सख्त ‘क्लियरेंस ज्योमेट्री’ ग्रिड को बेहद सुरक्षित बनाते हैं।
ग्रामीण इलाकों में एक मिथक यह भी तैरता है कि ये हाई-वोल्टेज लाइनें हवा में ही इंसानों को अपनी तरफ ‘खींच’ लेती हैं या दूर बैठे करंट मार देती हैं। विज्ञान इस कोरी कल्पना को खारिज करता है। बिजली को यात्रा करने के लिए एक माध्यम (Conductor) और जमीन तक जाने के लिए एक निश्चित मार्ग की जरूरत होती है। जब तक कोई जानबूझकर सुरक्षा नियमों को ताक पर रखकर टावर पर न चढ़े या किसी बड़े धात्विक उपकरण को तारों के एकदम पास न ले जाए, तब तक यह खतरा शून्य है।

भारत के सख्त विद्युत नियमों के तहत ‘ग्राउंड क्लियरेंस’ (जमीन से तारों की ऊंचाई) इतनी सटीक रखी जाती है कि नीचे ट्रैक्टर, हार्वेस्टर और आम जनजीवन बिना किसी खौफ के गुजर सके। यही नहीं, आज का आधुनिक ग्रिड ‘इंस्टेंटैनियस ट्रिप’ तकनीक से लैस है। यदि किसी प्राकृतिक आपदा के कारण तार टूट भी जाए, तो इंसानी पलक झपकने से भी कम समय (मिलीसेकंड) में पूरी बिजली स्वतः गुल हो जाती है।

5 ट्रिलियन डॉलर की अर्थव्यवस्था का हाइवे
ये ट्रांसमिशन लाइनें ही गुजरात के सबसे बड़े सपनों को हकीकत में बदल रही हैं। अगर आज कच्छ के मरुस्थल में आकार ले रहा 30 गीगावाट का दुनिया का सबसे बड़ा हाइब्रिड रिन्यूएबल एनर्जी पार्क अहमदाबाद और सूरत के उद्योगों और घरों को रोशन कर पा रहा है, तो इसके पीछे यही मूक नेटवर्क है। यही नेटवर्क ‘पीएम-कुसुम’ योजना को भी गति दे रहा है, जिससे हमारे किसानों को दिन के समय सिंचाई के लिए भरपूर बिजली मिल रही है।

किसी भी जागरूक नागरिक या भूमि मालिक के लिए, अपने क्षेत्र से गुजरती हुई ट्रांसमिशन लाइन कोई बाधा नहीं, बल्कि भारत को $5 ट्रिलियन की आर्थिक महाशक्ति बनाने में गुजरात की साझीदारी का गौरवचिह्न है। अफवाहों को दरकिनार कर विज्ञान सम्मत बुनियादी ढांचे को गले लगाना ही ‘गुजरात मॉडल’ को और अधिक ऊंचाइयों पर ले जाएगा। विकास की इन धमनियों को समझना और इन्हें स्वीकार करना ही नए भारत के निर्माण में हमारा सबसे बड़ा योगदान है।

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