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रबी 2026–27: पानी की उपलब्धता और खेती की आर्थिक स्थिति तय करेगी फसलों का चुनाव और इनपुट की मांग

उदय राज आनंद, सीईओ – डोमेस्टिक बिजनेस, पारिजात इंडस्ट्रीज

नई दिल्ली, 22 अक्टूबर: खरीफ़ सीजन के बाद, भारत का रबी 2026–27 सीजन चुनौतीपूर्ण परिस्थितियों के बीच शुरू हो रहा है। इसमें पानी की उपलब्धता, खेती की आर्थिक स्थिति और किसानों की वित्तीय हालत मुख्य कारक हैं, जो यह तय करेंगे कि कितनी ज़मीन पर खेती होगी और किन इनपुट (बीज, खाद आदि) की कितनी मांग होगी। रबी की बुवाई की तैयारी कर रहे किसानों के फैसले न केवल उपलब्ध पानी या फसलों की उपयुक्तता पर निर्भर करते हैं, बल्कि इस बात पर भी निर्भर करते हैं कि पिछले सीजन (खरीफ) से उन्हें कितनी कमाई हुई है।

पानी की कमी से बदलेंगे क्षेत्रीय फसल पैटर्न

जून–सितंबर 2026 के दौरान मानसून की बारिश ‘लॉन्ग-पीरियड एवरेज’ (दीर्घकालिक औसत) का केवल 87% रही। नतीजतन, 178 प्रमुख जलाशयों में पानी का भंडारण उनकी कुल क्षमता के 70% तक गिर गया, जो पिछले एक दशक के 76.62% के औसत से कम है। दक्षिण भारत में पानी की सबसे ज्यादा कमी है, जहां जलाशयों में क्षमता का केवल 50% पानी बचा है, जबकि पिछले साल यह 87.25% था।

पानी की यह कमी तय करेगी कि किस क्षेत्र में कौन सी फसलें उगाई जाएंगी। उत्तर भारत में, खासकर पंजाब, हरियाणा और उत्तर प्रदेश में, गेहूं की बुवाई सिंचाई की सुविधा, समय पर बुवाई और सर्दियों के तापमान पर निर्भर करेगी। तिलहन और दालों का रकबा (खेती का क्षेत्र) बाजार से मिलने वाले मुनाफे और मिट्टी में नमी की मात्रा पर निर्भर करेगा।

पश्चिमी भारत में, जिसमें राजस्थान और महाराष्ट्र शामिल हैं, मिट्टी में नमी कम होने के कारण किसान सूखे को सहने वाली फसलों, जैसे सरसों, दालें, तिलहन और ज्वार की ओर रुख कर सकते हैं। हालांकि, पानी की भारी कमी के कारण बुवाई में देरी हो सकती है या खेती का नियोजित रकबा कम हो सकता है। दक्षिण और पूर्वी भारत में, जलाशयों में पानी कम होने से धान और मक्का जैसी ज्यादा पानी मांगने वाली फसलों की खेती सीमित हो सकती है। वहीं, पूर्वी भारत के कुछ हिस्सों में देर से हुई भारी बारिश के कारण आलू और मक्का की खेती के लिए खेत तैयार करने में देरी हो सकती है।

खरीफ की कमाई का रबी सीजन के खर्चों पर असर

किसानों के पास मौजूद नकदी (लिक्विडिटी) सीधे तौर पर उनके निवेश की क्षमता को प्रभावित करेगी। ICRA की रिपोर्ट के अनुसार, सितंबर के अंत तक खरीफ फसलों के कुल रकबे में पिछले साल की तुलना में 1.2% की गिरावट आई है। सोयाबीन और कपास जैसी प्रमुख नकदी फसलों में पैदावार कम होने या सही दाम न मिलने के कारण खासकर महाराष्ट्र और मध्य प्रदेश में किसानों के पास नकदी की तंगी हो सकती है। बजट तंग होने की उम्मीद में, किसान बीज, खाद और फसल सुरक्षा उत्पादों पर अधिक सावधानी से खर्च कर सकते हैं।

स्मार्ट फसल सुरक्षा के ज़रिए पैदावार बढ़ाना

बदलती लागत और मौसम के जोखिमों के बीच, उत्पादकता को बचाए रखना बहुत ज़रूरी है। पारिजात इंडस्ट्रीज़ का मानना है कि संतुलित पोषण, पानी का सही प्रबंधन और ज़रूरत के अनुसार वैज्ञानिक तरीके से फसल की सुरक्षा करने से, नुकसान को कम करने और किसानों की आय को सुरक्षित रखने में मदद मिलेगी।

इस सीज़न में उत्पादकता बनाए रखने के लिए लचीली रणनीतियों की ज़रूरत है। जो किसान अपने क्षेत्र में पानी की उपलब्धता के हिसाब से फसल चुनते हैं, संसाधनों का समझदारी से प्रबंधन करते हैं और ज़रूरत के अनुसार फसल सुरक्षा के उपाय अपनाते हैं, वे अपनी पैदावार और मुनाफ़े को बेहतर ढंग से सुरक्षित रख पाएंगे।

अंततः रबी सीज़न की सफलता इस बात पर निर्भर करती है कि किसान अपने क्षेत्र की चुनौतियों का कितनी प्रभावी ढंग से सामना करते हैं, और साथ ही उत्पादकता, लागत और खेती की दीर्घकालिक स्थिरता के बीच कैसे संतुलन बनाए रखते हैं।

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